वंदे मातरम अनिवार्य किये जाने पर भड़के देवबंदी उलेमा, बोले- वन्दे मातरम् अपनी मर्जी से गाये तो ठीक जबरन थोपना गलत 

Deobandi Ulema are furious over Dhirendra Shastri's statement, Ulema saying "You will be better off if you stick to your statement."

सहारनपुर : केंद्र सरकार ने कार्यक्रमों के शुरू होने से पहले और सभी स्कूल कॉलेजों में वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के बाद खड़े होकर गाना अनिवार्य कर दिया है। सरकार के इस निर्देश के बाद एक बार फिर वंदे मातरम को लेकर देश में फिर से बहस छिड़ गई है। देवबंदी उलेमाओं ने सरकार के इस निर्देश का खुले शब्दों में विरोध किया है। देवबंदी उलेमाओं का कहना है कि वंदे मातरम को लेकर पहले भी उलेमा नाकार चुके हैं। क्योंकि वंदे मातरम गीत में कुछ अल्फाज ऐसे हैं जिनका उच्चारण करना इस्लाम में जायज नहीं है। इन शब्दों से किसी देवी देवता की पूजा होती है लेकिन इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा करना हराम माना जाता है। अगर कोई स्वेच्छा से वंदे मातरम गाना चाहता है तो बखूबी गाए लेकिन जबरन किसी धर्म विशेष पर थोपना लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। ऐसे में इसे अनिवार्य करने से पहले सरकार इस पुण्य विचार करना चाहिए।

प्रसिद्द देवबंदी उलेमा कारी इश्हाक गोरा ने कहा कि हमें याद रखना चाहिए तमाम हिन्दुस्तानियों के दिनों में देश भक्ति होना बेहद जरुरी है। देश भक्ति के लिए नारा देने से पहले नारा देने वालों को भी और नारा अनिवार्य करने वालों को भी ये ध्यान रखना चाहिए इस नारे में कहीं ना कहीं किसी विशेष धर्म को आंच तो नहीं आ रही है। अगर आंच आ रही है तो उसे अनिवार्य नहीं करना चाहिए। जो इसको गाना चाहे शौंक से गाये अगर कोई नहीं गाना नहीं चाहता तो उसके साथ जोर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। वनडे मातरम आज से कुछ साल पहले हमारे उलेमा और धर्म गुरुओं इस पर आपत्ति जाहिर की थी। वो आपत्ति ये थी कि इसमें कुछ अल्फाज का इस्तेमाल किया है। मजहब ए इस्लाम बहुत डिस्प्लीन से चलने वाला धर्म है।
मजहब ए इस्लाम में अल्लाह के आलावा किसी और की इबादत बिलकुल भी गुंजाइश नहीं करती है। वंदे मातरम अगर कोई गाना चाहे तो गाये लेकिन जबदस्ती अनिवार्य करना लोकतंत्र के खिलाफ है। लोकतंत्र में किसी के साथ जोर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। अगर सरकार ने इस पर गौर और फ़िक्र नहीं किया तो मुझे लगता है सरकार को इस पर पुण्य विचार करना चाहिए। सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत अलग हो गया और राष्ट्र के बारे और भी बहुत सारे नारे हैं। जैसे हिन्दुस्तान जिंदाबाद, इंडिया जिंदाबाद के अलावा राष्ट्रगान हम गाते हैं। वंदे मातरम में कुछ अल्फाज ऐसे हैं अगर तफ़्सीर से समझाएं तो सिर्क वो होता है आप अल्लाह के बराबर किसी और को नहीं ले जा सकते। इस्लाम में यह कतई जायज नहीं है। वंदे मातरम में कुछ चीजें ऐसी जाहिर हो रही हैं जो इंसान को सिर्क में ले जा रही हैं और सिर्क इस्लाम में गुंजाइश से बाहर है।
इस्लामिक धर्मगुरु मौलाना साजिद रशीदी का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 28 जनवरी को एक आदेश जारी किया है। जिसमें कहा गया कि अब वंदे मातरम तमाम सरकारी जगहों पर अनिवार्य होगा और उसके लिए सबको खड़ा होना पड़ेगा। यह आदेश कहीं ना कहीं मुसलमानों को चिढ़ाने और मुसलामनों को नीचादिखाने के लिए इस तरह के आदेश पारित किये जा रहे हैं। जबकि 2016 का सुप्रीम कोर्ट का देश है जिसमें राष्ट्र्गान के लिए भी अगर कोई आदमी नहीं खड़ा होता है तो उसको भी देश द्रोही नहीं कहा जाएगा। लेकिन जान बूझकर इस तरह के आदेश पारित करना ये कहीं ना कहीं वोट बैंक की राजनीती की तौर पर देखा जा रहा है। मुसलमानों की आस्था के मुताबिक़ वंदे मातरम नहीं गाया जा सकता तो इस पर फ़ोर्स करना ना तो सविधान कहता है और ना ही कोर्ट कहता है।
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